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विवेकानन्द केन्द्र कन्याकुमारी के संस्थापक माननीय एकनाथजी के जीवन चरित्र का हुआ जीवन्त प्रदर्शन 

प्रो0 वासुदेव देवनानी एवं अनिता भदेल सहित शहर के गणमान्य जनप्रतिनिधियों एवं सैंकड़ों कार्यकर्ताओं ने पूरे दो घण्टे तक हॉल में देखी फिल्म

कन्याकुमारी की शिला पर जब सती ने तपस्या की थी और समुद्र के तट पर रहकर कैलाशपति का ध्यान किया था तो उसी एक घटना से यह सिद्ध हो जाता है कि भारत की सनातन एकात्मता अनन्तकाल से विद्यमान रही है। कुछ ऐसा ही कार्य एकनाथ जी द्वारा विवेकानंद शिला स्मारक बनाते समय हुआ जब उन्होंने कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक पूरे भारत को एक करते हुए इस राष्ट्रीय स्मारक के लिए धन एकत्र किया। वे जानते थे कि भारत के उत्कर्ष में ही विश्व का कल्याण छिपा हुआ है। संसार को श्रेष्ठ बनाने के लिए अपना दृष्टिकोण प्रतिपादित करना और विवेकानंद के मार्ग पर चलने वाली जनचेतन जगाना ही हमारा कार्य है। भौतिकवाद के कारण उत्पन्न समस्यों से निपटना विश्व के लिए जहाँ एक चुनौती है वहीं यह हमारे लिए एक अवसर है जिसका लाभ उठाकर हम भारत के पौरूषत्व को जगाएं और वसुधैव कुटुंबकम का संदेश देने वाले प्रकट कार्य करने के लिए तत्पर हो सकें। ऐसे कार्य की प्रेरणा देने वाले एकनाथजी जैसे कर्मयोगियों की आज भारत को आवश्यकता है। आज कथा या भाषण की जरूरत नहीं है बल्कि विशुद्ध कर्म करने की आवश्यकता है। स्वामी विवेकानंद कहते थे कि गीता पढ़ने की बजाय विद्यार्थी फुटबॉल खेलें और फुटबॉल की किक मारने पर फुटबॉल जितना ऊपर जाएगा उतना ही कर्मयोग दृढ़ होगा। उक्त विचार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्र कार्यवाह श्री हनुमान सिंह जी राठौड़ ने विवेकानंद केंद्र कन्याकुमारी राजस्थान प्रांत द्वारा आयोजित एकनाथजी - एक जीवन एक ध्येय फिल्म के प्रदर्शन के अवसर पर मृदंग सिनेमा में व्यक्त किए।

इस अवसर पर कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि शिक्षा राज्य मंत्री प्रोफेसर वासुदेव देवनानी ने विवेकानंद केंद्र के कार्य को जमीन से जुड़ा हुआ कार्य बताया और एकनाथ जी के साथ अपने जीवन से जुड़े संस्मरण साझा करते हुए कहा कि जब शिला स्मारक बन रहा था तब गांव गांव जाकर धनराशि के एकत्रीकरण का कार्य में सक्रिय रुप से सहयोग करने का अवसर उन्हें भी मिला था। महिला एवं बाल विकास राज्य मंत्री श्रीमती अनिता भदेल ने भी इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त किए।

इससे पूर्व फिल्म के बारे में बताते हुए साहित्य अकादमी के सदस्य उमेश कुमार चौरसिया ने कहा जब स्वामी विवेकानंद ने जब 25, 26 एवं 27 दिसंबर 1892 को कन्याकुमारी की प्रसिद्ध शिला पर ध्यान किया था और उसके उपरांत 11 सितंबर 1893 को संपूर्ण विश्व में भारत की प्राचीन संस्कृति और सभ्यता के विषय में विश्व के दृष्टिकोण को बदल दिया था। तब स्वामी विवेकनंद के शताब्दी वर्ष में उस शिला पर भव्य स्मारक करने का निर्णय तमिलनाडु की स्थानीय समिति ने लिया। तत्कालीन राजनीतिक कारणों से स्मारक निर्माण में उत्पन्न बाधाओं के निराकरण के लिए स्थानीय समिति राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री गुरु जी से मिली और श्रीगुरु जी द्वारा माननीय एकनाथ जी रानडे को शिला पर स्मारक स्थापित करने का कार्य दिया गया। जहां छोटी-छोटी परियोजनाओं के लिए भी वर्षों लग जाते हैं वहीं इतने भव्य स्मारक का निर्माण को मूर्त रुप केवल 6 वर्ष की अवधि में देकर एकनाथ जी ने यह सिद्ध कर दिया कि किसी भी कार्य के लिए केवल दो चीजों की आवश्यकता होती है एक दृढ़ इच्छा शक्ति और दूसरा कार्य करने के लिए तत्परता। आज यह स्मारक प्रत्येक भारतवासी के लिए एक प्रेरक स्मारक है जहाँ प्रतिदिन हजारों की संख्या में लोग इसे देखने पहुंचते हैं। एकनाथजी केवल यही नहीं रुके। उनका मानना था कि केवल पत्थर का स्मारक बनाने के लिए उनका चयन नहीं हुआ है बल्कि ऐसा जीवन्त स्मारक बनाना जिससे स्वामी जी के विचारों को जन जन तक पहुंचाया जा सके। इस निमित्त उन्होंने इस कार्य के निर्माण के 2 वर्ष बाद ही 1972 में विवेकानंद केंद्र की स्थापना की। 

अजमेर का यह सौभाग्य रहा अजमेर शाखा का की स्थापना माननीय एकनाथ जी द्वारा स्वयं अपने हाथों से की गई।

नगर प्रमुख रविन्द्र जैन ने बताया कि इस फिल्म के प्रदर्शन में महापौर श्री धर्मेन्द्र गहलोत, श्री कंवल प्रकाश किशनानी, श्री सुनील दत्त जैन, भाजपा के शहर अध्यक्ष श्री अरविंद यादव, श्री चन्द्रेश सांखला का सक्रिय सहयोग रहा तथा मृदंग सिनेमा के श्री जयसिंह मेवाड़ा एवं उमेश मेवाड़ा ने इस फिल्म के प्रदर्शन के लिए निःशुल्क थिएटर उपलब्ध कराया।

यह था फिल्म में एकनाथ जी के बचपन की घटनाएं जिसके कारण उन्हें अपने परिवार में एक अभिशाप माना गया और अपने माता-पिता के प्राणों के लिए एक संकट बताया गया उन्होंने अपने बड़े भाई और भाभी के घर पर रह कर अपनी शिक्षा-दीक्षा ग्रहण की। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्कार पाकर एक संगठक के रुप में पूरे देश के युवाओं के एकत्रीकरण के लिए वे प्रचारक बन कर निकल पड़े। अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में जब विवेकानन्द शिला स्मारक का दायित्व उन्हें सौंपा गया तब इसके निर्माण में उत्पन्न सामाजिक बाधाओं और राजनीतिक चुनौतियां का सामना बड़ी कुशलता के साथ उन्होंने किया और धुर विरोधी कहे जाने वाले दलों को भी इस कार्य के लिए अत्यंत कुशलता और चातुर्य से तैयार किया। युवाओं को इस फिल्म से प्रेरणा मिलती है कि किस प्रकार अपने जीवन की कठिन से कठिन चुनौतियों का सामना विचलित हुए बिना बुद्धि के चातुर्य और मन की स्थिरता से किया जा सकता है। 

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